bihar board class 10th physics important objective & subjective question in hindi

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परिचय

विध्युत धारा जिसे हम अपनी भाषा मे बिजली भी कहते है । साधारणतः बिजली हमारे रोजमरा की जंदगी मे बहुत ही मत्वपूर्ण भूमिका रखता है , जैसे की हमारा मोबाइल फोन से लेकर हमारे कमरे मे जल रहे बल्ब तक के पीछे इसी विध्युत का भूमिका है । आज की इस आधुनिक युग मे बिजली की इतनी भूमिका है की बिना इसे हम जीने की कल्पना भी नही कर सकते । हमारे घरो मे उपयोग होने वाले कूलर , पंखा , जलता हुआ बल्ब , दूरदर्शन जिसे हम बोलचाल की भाषा मे टीवी बोलते है , टेलीफोन इन सभी मे बिजली का ही अहम रोल होता है , इन सभी मे बिजली के बिना इस उपकरण को उपयोग नही कर सकते है ।

 

अब हम बात करेंगे की ये बिजली या विधयुत धारा क्या होता है ।

बिजली या विधयुत धारा कहने से हमारा तात्पर्य होता है की तारो से होकर आवेश (charge) का प्रवाह ।

अब हम जानेंगे की charge अर्थात आवेश क्या होता है –

Charge अर्थात आवेश किसी भी पदार्थ का वह भौतिक गुण होता है जिसे किसी भी वस्तु को एक दूसरे पर रगड़ने से आता है चाहे वह ऋण आवेश हों  या धन आवेश । charge या आवेश की यह एक मूल गुण होता है ।

Charge या आवेश मुख्यतः दो तरह के होते है :-

  1. धनावेश (positive charge ) :- हम जानते है की किसी भी परमाणु मे प्रोटोन तथा इलेक्ट्रॉन समान मात्रा मे रहता है । जब प्रोटोन की संख्या से इलेक्ट्रॉन की संख्या कम   हो जाती है तो प्रायः वह परमाणु धन आवेशित हो जाता है ।
  2. ऋणावेश ( negative charge ):- जब किसी परमाणु मे इलेक्ट्रॉन की संख्या प्रोटोन की संख्या से अधिक हो तो वह परमाणु ऋण आवेशित हो जाता है ।

Electron > Proton = negative charge

Electron < Proton = positive charge

NOTE :-  प्रायः इलेक्ट्रॉन ऋण आवेशित होता है तथा प्रोटोन धन आवेशित होता है । 

  • आवेश धन आवेश या ऋण आवेश होता है यह बात पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिक  बेंजामिन फ़्रेंकलिन ने बताया था ।

हम जानते है की किसी भी पदार्थ के परमाणुओ की बनावट तीन मौलिक कणो से मिलकर बनी होती है जो है :-

  1. इलेक्ट्रॉन ( ELECTRON ) जो की ऋण आवेशित होता है
  2. प्रोटोन ( PROTON ) जिस पर धन आवेश होता है , और
  3. न्यूट्रॉन ( NEUTRON ) इस पर कोई आवेश नही होता है ।
  • हम जानते है की प्रोटोन तथा न्यूट्रॉन किसी भी परमाणु के केन्द्रीय भाग जिसे हम nucleus या नाभिक कहते है , मे रहता है । नाभिक के अगल बगल मे  कुछ कक्षा होता है , जिसमे इलेक्ट्रॉन होता है और घूमता रहता है ।
  • इलेक्ट्रॉन पर जितना ऋण आवेश होता है उतनी ही आवेश प्रोटोन पर धन आवेश के रूप मे रहता है ।
  • किसी भी परमाणु मे धन आवेश अर्थात प्रोटोन तथा ऋण आवेश अर्थात इलेक्ट्रॉन की संख्या बराबर होती है , अतः हम कह सकते है की परमाणु विधयुतः उदासीन ( electrically neutral ) होता है ।

 चूंकि वस्तू  का निर्माण परमाणु से होता है और परमाणु मे समान मात्रा  मे धन आवेश और ऋण आवेश अर्थात प्रोटोन तथा इलेक्ट्रॉन होता है इसलिए परमाणु विधयुतः उदासीन होता है । 

कभी कभी यह भी देखा जाता है की वस्तु मे इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन की समान मात्रा नही रहने पर संतुलन बिगर जाता है  उदाहरण के  लिए , एक काँच की छड़  को रेशम को कपड़े से रगड़ते है तो काँच की छड़ के पास से थोड़ा सा इलेक्ट्रॉन रेशम के कपड़े पर चलीं जाती है । परिणामस्वरूप काँच की छड़ पर धन आवेश का परिमान अब ऋण आवेश के परिणाम से अधिक हो जाता है और तब हम कहते है की धनावेश हो गयी है  काँच की छड़ । और रेशम के कपड़े पर थोड़ा सा इलेक्ट्रॉन आ गया है इसलिए  हम कह सकते है की रेशम का कपड़ा ऋणावेशित हो गया है । इसी तरह  एबोनाइट की छड़ को जब ऊन से रगड़ते है तो कुछ इलेक्ट्रॉन ऊन से एबोनाइटकी छड़ पर आ जाती है जिसके परिणामस्वरूप एबोनाइटकी छड़ ऋणावेशित हो जाती है ।

इस प्रकार हम देखते है की –

   धनावेशित का अर्थ होता है –  परमाणु से कुछ इलेक्ट्रोनों का बाहर निकल जाना । 

आसानी से समझने के लिए , इलेक्ट्रॉन देने वाले को हम धनावेशित कहेंगे ।

ऋणावेशित का अर्थ होता है – परमाणु के द्वारा इलेक्ट्रॉन को ग्रहण कर लेना ।

आसानी से समझने के लिए, इलेक्ट्रॉन को लेने वाले को ऋणावेशित कहेंगे ।

दूसरे शब्दो मे –  हम कहेंगे की इलेक्ट्रोनों को खोकर कोई पदार्थ धनावेशित हो जाता है और ईलेक्ट्रोनों को पाकर ऋणावेशित

इन सभी प्रयोगो को देखने के बाद हम कह सकते है की दो वस्तु को जब आपस मे एक दूसरे के साथ रगड़ने पर एक वस्तु धनावेशित तथा दूसरा वस्तु ऋणावेशित हो जाता है । तथा एक बात की जानकारी और मिलती है की आवेश न तो नष्ट होता है और न ही उत्पन्न होता है मतलब जो वस्तु जितना धनावेशित होता है उतना ही दूसरा वस्तु ऋणावेशित हो जाता है । आसान भाषा मे एक वस्तु जितना आवेश देता है उतनी ही आवेश दूसरी वस्तु ले लेता है । अतः हम कह सकते है की सिर्फ इलेक्ट्रोनों का पुनरवितरण (redistribution) हुआ है । इस प्रकार भौतिकी  का एक महत्वपूर्ण नियम को जाने । यह नियम कहता है की –  आवेश हमेशा अपना आस्तित्व बनाए रखता है , इसे न ही निर्माण किया जा सकता है और न ही खत्म (destroy)किया जा सकता है । 

इस नियम को हम एक बार जाने थे – ऊर्जा के संदर्भ मे ।

जिस प्रकार ऊर्जा को भी ना तो निर्माण किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है केवल ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तित किया जा सकता है , उसी प्रकार आवेश को  भी न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है बस एक दूसरे पर जाकर ऋणावेशित और धन आवेशित हो जाता है ।

अतः इस पाठ मे हमने विद्धुत धारा की बेसिक बातो को जाना , साथ ही यह भी जाना की आवेश क्या होती है । अब हम अगले पाठ मे जानेंगे की विद्धुत के प्रवाह के आधार पर वस्तु के प्रकार ।

 

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